Tuesday, 19 August 2014

बस इतने तो थे मेरे सपने - तो कौन है ज़िम्मेदार?



दुनिया में आँख खोलते ही शुरू हो जाती है जंग अपनी किस्मत से ज़िन्दगी के लिए,अपने वजूद के लिए,अपनी पहचान के लिए। कोख  से अपनी किस्मत नहीं लिख कर लायी थी मैं पर मुझे क्या पता था कि मेरी किस्मत इस तरह मेरी ज़िन्दगी बदल देगी। जन्म से ही अपने साथ कुछ सपने ले कर आयी थी मैं :
खुली हवा में साँस लेना ,आसमान में पंछी की तरह उड़ना ,अपनी एक अलग पहचान बनाना। बस इतने से थे मेरे सपने।
           खुले आसमान में उड़ने से पहले ही पंख काट दिए जाते है पर कुछ को तो अपनी ज़िन्दगी की पहली सांस लेना भी भरी पड़ जाता है।  सांस लेने से पहले ही उनकी सांस रोक दी जाती है।  तब क्या मतलब उन सपनों का ,उस वजूद का और उस पहचान का बस रह  जाती है तो सिर्फ निराशा।  खुशकिस्मती से अगर जी लेते हैं वो अपनी ज़िन्दगी कि कुछ सांसे तब करना पड़ता  है सामना संघर्ष से -कभी अपने परिवार से तो कभी समाज से। अगर मैं  बात करुँ अपने सपनों कि तो खुली हवा में सांस लेना था मुझे। अपने पैरों पर खड़ा होना था मुझे।  अपनी एक अलग पहचान बनानी थी मुझे।  आसमान में पंछी कि तरह उड़ना था मुझे। बिना रोक-टोक अपनी मंज़िल तक पहुँचना  था मुझे ।  मुझे चाहिए थी तो सिर्फ बराबरी और आज़ादी अपने परिवार में और अपने समाज में। क्या ये सब मुमकिन है इस निर्दयी समाज में ? आगे बढ़ने से पहले ही रोक दिए जाते है।  सवाल उठाने से पहले ही चुप करा दिए जाते हैं।  पर डट कर सामना करना आता है हमें। अपने सपनों को पूरा करना ,अपनी पहचान बनाना आता है हमें।
            अपने सपनों को पूरा न कर पाने का अगर कोई गुनाह है तो वह है मेरा लड़की होना। क्या इस समाज में एक लड़की को खुली हवा में सांस लेना का हक़ नहीं है?क्यों अपनी पहचान बनाने के लिए लड़ना पड़ता है उसे ? अपने घर में एक बेटी कि तरह जन्म लेकर आयी थी मैं पर एक बेटे कि तरह रहना था मुझे। पर एक सवाल में आपसे पूछती हूँ क्या आज तक किसी लड़की को एक लड़के का हक़ मिला है? हमेशा  जवाब में मुझे सुनना  पड़ता है तो वो है "न" .
अब तो ये "न" ही मेरी ज़िन्दगी बन के रह गया है। आज़ादी के लिया आवाज़ उठाई तो सुनना पड़ा न।  परिवार में और समाज में बराबरी मांगी तो भी मिला सिर्फ न। धीरे -धीरे इन संघर्षों का सामना करते हुए पार हो गया मेरी ज़िन्दगी का एक पड़ाव।  अब अपने पैरों पर खड़े होने के लिए लड़ना था मुझे। बिना रोक -टोक अपनी मंज़िल तक पहुचना था मुझे।  पर कहते है न ज़िन्दगी बहुत कुछ सिखा देती है।  मुझे भी मेरी किसमत ने बहुत मजबूत बना दिया है। बार बार सिर्फ न सुनना और अपने सपनों के लिया लड़ना। अब किसी भी संघर्ष से डर लगता नहीं मुझे। बस अपनी मंज़िल तक पहुँचना  है
मुझे।
              परिवार से लड़ने के बाद सामना होता है प्रशासन से जो ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में डूबा है।  यह एक और गन्दा चेहरा है हमारे समाज का। इस भ्रष्टाचार के युग में हमारे समाज का सबसे बड़ा रूल -पैसा हो तो आगे बढ़ो और न हो तो चलते बनो। इस समाज से लड़ते-लड़ते खत्म हो जाएगी मेरी ज़िन्दगी और रह जाएगी तो सिर्फ निराशा।
खुली हवा में साँस लेना ,आसमान में पंछी कि तरह उड़ना , अपनी एक अलग पहचान बनाना। बस इतने से ही तो थे मेरे सपने।

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